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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

कल्पान्तपवनोद्भ्रान्तैर्लोकान्तरजरत्तृणैः । आरब्धार्जुनवाताख्यास्तम्भमुद्भूतभस्मभिः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

“अर्जुन वात" यह एक वातरोग विशेष का नाम है । जिसे यह रोग होता है उस रोगी को यह रोग आकाश में ले जाकर खूब नचाता है । परन्तु उस रोग में अर्जुन की वर्णता नहीं है, अतः उसका नाम आलम्बनशून्य न रहे, इस मतलब से कल्पान्त पवनो के द्वारा उड़ाये गये लोकान्तर के जीर्णतृणों ने स्वोद्भूत भस्मों द्वारा वात को सफेद बनाकर उस त्रिलोकी में अर्जुन वात नामक रोग का एक स्तम्भ खड़ा कर दिया यानी उसे आलम्बनयुक्त कर दिया