Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
ग्रहतारागणैरुग्रैर्व्यग्रैर्विग्रहदुर्ग्रहैः ।
पतद्भिर्द्विगुणालातलतामावर्तपातिभिः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
ग्रह और तारों का समूह बड़ा ही उग्र एवं व्यग्र प्रतीत हो रहा था, ये एक
दूसरे पर प्रहार करने में तुले हुए थे, अतएव ये वर्तुलाकार में परिणत होकर अन्त में गिर भी रहे थे,
इसलिए आकाशमण्डल में भी इन्होंने पृथ्वी की अपेक्षा द्विगुण अलातलता को पैदा कर दिया
था