Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथावनिपयस्तेजःपवनानां युगक्षये ।
जाते परमसंक्षोभे बभूवास्मिञ्जगत्त्रयम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, युगक्षय में जब पृथ्वी, जल, तेज एवं वायु-इन चार
महाभूतो का परम विक्षोभ हो गया, तब तीनों जगत् की जो स्थिति हुई, उसे कहता हूँ, आप
सुनिये
सर्ग सन्दर्भ
छिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त सतहत्तरवाँ सर्ग॑ पुष्करावर्तक मेघ की वृष्टिधारा से जर्जर एवं सात समुद्रौ के विक्षोभ से धोये गये जगत् का पुनः वर्णन।