Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
नश्यन्नगवराभोगैर्भागैर्भग्नसुरालयैः ।
आवर्तघर्घरारावैर्जलमूर्ध्वमधोनलम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, उस समय तीनों जगत् का स्वरूप इस तरह दिखाई दे रहा था-बड़े-बड़े विशाल पर्वत नष्ट
हो रहे थे, और देवमन्दिर भी टूट रहे थे-इससे जो उनके अनेक विभाग निकले वे उलटे-पुलटे हो
गये यानी दोने या कठवत के समान ठीक विपरीत हो गये, इसलिए घरघर शब्दों के साथ ऊपर की
ओर तो जल भर गया ओर नीचे की ओर निर्बाध अग्नि जलने लगी