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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

तृणराशिसरिन्यायमिश्रद्वीपार्णवोत्कटम् । अत्यन्तदूरचिद्व्योमक्षणज्वालासहावनम् ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

उस काल मेँ समस्त जगत्‌ नदियों में मिली हुई तृणराशि के सदृश समुद्र मेँ मिले हुए बड़े-बड़े द्रीपोँ के कारण बड़ा ही विकट लग रहा था । (तत्वज्ञान से प्रदीप्त विदाकाशरुप अग्नि से एक क्षण में नष्ट हो जानेवाले जगत्‌ क प्रलय काल में जो देर से दाह हुआ, इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए, इस्र आशय से कहते हैं ८) तत्त्वज्ञान की दुर्लभता के कारण अत्यन्त दूर चिदाकाश में सारे जगत्‌ की स्थिति क्षणभर भी ज्वाला सहने में समर्थ नहीं थी