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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 72

इकहत्तरवाँ सर्ग समाप्त बहत्तरवों सर्ग ब्रह्माजी के प्राणनिरोध से वायु के क्षय का और प्रसंगवश पूछी गई विराट्‌ स्थिति का वर्णन।

30 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, तदनन्तर जब विराट्स्वरूप ब्रह्माजी ने अपनी प्राणवायुओं का न…
  2. Verse 2वे वातस्कन्ध नाम से स्थित वायु ही विराट्‌ ब्रह्मा के प्राण हैं, इसलिए जब उनका उन्होने उपस…
  3. Verses 3–4इसी हेतु से ब्रह्माजी ने जब प्राणवायु रूप वातस्कन्ध का अपने में उपसंहार करना आरम्भ किया,…
  4. Verse 5इस भूखण्ड मेँ जो पुण्यफल कमाया जाता है, उसको भोगने के लिए स्थान एक विमान हैं । इन विमानों…
  5. Verse 6ब्रह्माजी का संकल्परूप इन्धन जब प्रलयोन्मुख हो गया, तब दीप्त ज्योतियों के सदृश सिद्धं की…
  6. Verse 7खेचर आदि स़िद्धियाँ विनाशी एवं तुच्छ हैं; इसको सवित करते हुए कहते हैं / जब अपनी शक्ति का…
  7. Verse 8कल्पवृक्षो के समूह, इन्द्र आदि के साथ उनके नगर और भूकम्प से चंचल हुए सुमेरु पर्वत के शिखर…
  8. Verse 9ब्रह्माजी की स्थूल देह तो ब्रह्माण्डरूप विराट है, इस विराट्‌ शरीर के भीतर सत्यलोक निवासी…
  9. Verse 10हे ब्रह्मन्‌, यदि यह माना जाय कि चतुर्मुख साकार हैं, तो अल्प नापवाले ब्रह्माजी के ये अतिव…
  10. Verse 11हे भगवन्‌, मेरा व्यक्तिगत निश्चय तो यह है कि यह संकल्पमात्रस्वरूप ब्रह्माजी निराकार हैं औ…
  11. Verse 12अब पहले जो प्रश्न किया गया हैं कि स्थूलदेह मनोमयवेहरूप और पृथ्वी आदि उसके अवयव के है ? इस…
  12. Verse 13इसी परमाकाश ने अपने असली स्वरूप का अपरित्याग कर यानी स्वयं विकार को न प्राप्त होकर ही अपन…
  13. Verses 14–15हे श्रीरामजी, बोध्य, बोध ओर बोद्धरूप (ज्ञेय, ज्ञान ओर ज्ञातारूप) त्रिपुटी के मनन से घनीभू…
  14. Verse 16तदनन्तर विशाल वह मन अहंकार की भावना कर जब स्फुरित होता है, तब "अहम्‌" रूप धारण करता है, प…
  15. Verse 17अहंकार की कल्पना के बाद स्थूल देह की कल्पना भी उसकी अवस्तुभूत ही है, यह कहते हैं / संकल्प…
  16. Verse 18यही जिस आकार की भावना करता है, उसे जानता है, देखता है और अनुभव भी करता है, वास्तव में संक…
  17. Verse 19यदि देह शून्य है. तो वह साकार कैसे अनुभूत होगी, इस पर कहते हैं / भद्र, जैसे आप शून्यस्वरू…
  18. Verse 20प्रलय ओर मोक्ष आदि की कल्पना भी ऐसी ही असत्‌ है, यह कहते हैं / संवित्‌ आत्मा स्वयं तो निर…
  19. Verse 21कब शान्त हो जाता हैं, उसे कहते हैं / जब हम लोगों को तत्त्वज्ञान हो जाता है, तब विस्तृत यह…
  20. Verse 22असल में जो सत्यरूप ब्रह्म वस्तु है, उसका ठीक ठीक परिज्ञान हो जाने पर इसी जन्म में मिथ्या…
  21. Verse 23ठीक यही बात रहे, परन्तु इससे क्या मेरे प्रश्न का उत्तर हो गया, इस पर कहते हैं / भद्र श्री…
  22. Verse 24संकल्पाकाशरूपी ब्रह्माजी की जो भ्रान्ति उठी है, वही यह जगत्‌ भासता है और वही ब्रह्माण्ड क…
  23. Verse 25अथवा जाग्रदुन्मुखता मे स्वप्न के देहांगों के उपहार से कैसे स्वप्न के भूमि आदि लोकों का उप…
  24. Verse 26जयत्‌ अवास्तव है, यह कैसे आपने जाना, उक्त प्रश्न पर उसकी अर्स्रभाव्यता हैं, इसलिए, यों उत…
  25. Verse 27इसलिए यह असत्‌ ही उत्पन्न हुआ है, असत्‌ ही देखा जाता है और असद्रूप ही जगत्‌ प्रिय-अप्रियर…
  26. Verse 28इस्रीको विस्पष्ट रूप में कहते हैं / चिन्मात्र ब्रह्म ही धर्मी जगत्‌ एवं उत्पत्ति आदि धर्म…
  27. Verse 29यह न द्वैतरहित है, न अद्रैतरहित है ओर न द्वैताद्वेत से ही रहित है उस चिदाकाश को ही आप जगत…
  28. Verse 30हे राघव, इस कारण मैं सभी तरह के विशेषणो से निर्मुक्त होकर स्थित हूँ । मैं परमार्थतः सत्‌…
  29. Verse 31श्रीरामचन्द्रजी, आप समस्त वासनाओं को छोड दीजिये, मनका सन्ताप छोडिये, व्यर्थ के वागूजाल मे…
  30. Verse 32इसलिए समस्त दृश्य ब्रह्मरूप ही हैं, श्रान्ति के आकार में परिणत हुए उसके नानाविध अज्ञान ही…