Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
कथमेतानि चाङ्गानि ब्रह्मंस्तस्य स्थितानि च ।
कथं वा सोऽन्तरे तस्य स्वस्यैव वपुषः स्थितः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
हे ब्रह्मन्, यदि यह माना जाय कि चतुर्मुख
साकार हैं, तो अल्प नापवाले ब्रह्माजी के ये अतिविस्तृत पृथ्वी आदि अंग बनकर कैसे स्थित हो
सकते हैं ? यदि कहें कि ब्रह्मा भी अतिविस्तृत हैं, तब वे अपने ही शरीररूप इस ब्रह्माण्ड के अन्दर
सत्यलोक में कैसे रह सकते हैं