Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
तत्संकल्पचिदाभासनभोऽहमिति भावितम् ।
असत्तमेवानुभवत्संनिवेशं खमेव खे ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
अहंकार की कल्पना के बाद स्थूल देह की कल्पना भी उसकी अवस्तुभूत ही है, यह कहते हैं /
संकल्पात्मक चिदाभासरूप आकाश, जो कि अहंरूप भावना से भावित किया गया है, उक्त
स्थूलदेह के रूप का अनुभव करता है । वास्तव में यह असत् ही है, इसलिए इसके अवयव भी आकाश
में आकाशरूप के सदृश ही हैं