Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
क्वचिन्मात्रेऽमले व्योम्नि कथं वा केन वा जगत् ।
किं जायते किमत्रास्ति कारणं सहकारि यत् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जयत् अवास्तव है, यह कैसे आपने जाना, उक्त प्रश्न पर उसकी अर्स्रभाव्यता हैं, इसलिए, यों
उत्तर देते हैं /
चैतन्यरूप जो निर्मल आकाशवस्तु है, उसमें कहाँ, कैसे और किस हेतु से जगत् की सत्ता हो
सकती है, उसमें उसकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है और उस उत्पत्ति में सहकारी कारण कौन हो
सकते हैं यानी ब्रह्मचैतन्य में विचारने पर जगत् की सर्वथा ही असंभावना है