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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । चिति संकल्पमात्रात्मा विराड् ब्रह्मा जगद्वपुः । किमङ्गं तस्य भूलोकः किं स्वर्गः किं रसातलम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजी की स्थूल देह तो ब्रह्माण्डरूप विराट है, इस विराट्‌ शरीर के भीतर सत्यलोक निवासी वतुर्मुख देह तो उ-उ विद्‌ के मन से कल्पित एक प्रातिभासिक रूप हैं; यह वार गुखवाली देह ब्रह्माजी की स्थूल देह नहीं मानी जा सकती, क्योंकि ऐसा माननेपर तो उसकी स्थिति विराट्देह के भीतर हो नहीं सकती, आज तक किसी की भी स्थूल देह में दूसरी स्थूल देह देखी या चुनी नटी है / इस स्थिति में प्रातिभाकिक मानसिक चतुर्मुख देह में. जो एक तरह से स्वप्न छी हैं, ग्राणों के उपरसहार से विराट्‌ देह के स्तम्भक प्राणस्थानीय वायु आदि का विनाश केसे हो सकता है, क्योकि स्वप्नदेह में प्राणउपर्सहार से मरण दीखने पर जाग्रत-शरीर में प्राण का उपसंहार होकर किसी भी मनुष्य की स्थूलदेह का विनाश नहीं देखा जाता, इस आशय से श्रीरामजी शंका करते हैं / श्रीरामजी ने कहा : गुरुवर, चतुर्मुख ब्रह्माजी तो चिति के संकल्पस्वरूप मन हैं ओर वे विराट्‌ एवं ब्रह्माण्डशरीर हैं, यह बात प्रसिद्ध है, इस संकल्पस्वरूप चतुर्मुख के भूलोक आदि अवयव ही नहीं हो सकते, क्योकि अमूर्त (निराकार) मन के साकार अंग नहीं होते । यदि होते हैं, तो भूर्लोक कौन-सा अंग है ? स्वर्ग कौन-सा अंग है ?