Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
आदौ तावदिदं नासन्न सदास्ते निरामयम् ।
चिन्मात्रपरमाकाशमाशाकोशैकपूरकम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
अब पहले जो प्रश्न किया गया हैं कि स्थूलदेह मनोमयवेहरूप और पृथ्वी आदि उसके अवयव
के है ? इसका अनुभव कराने के लिए मूलवस्तु के दिग्दर्शन द्वारा शूमिका कोते हैं ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, पहले तो न कोई असत् वस्तु थी और न सत्
वस्तु ही थी, किन्तु सभी तरह के सदादि विकारों से रहित चिन्मात्र परमआकाश ही था, वही सब
तरह की अभिलाषाओं और दिशाओं को एकमात्र पूर्ण करनेवाला था