Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
अनादिनित्यानुभवो य एकः स एव दृश्यं न तु दृश्यमन्यत् ।
सत्यानुभूतेऽननुभूतयो याः सुविस्तृता दृश्यमहादृशस्ताः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए समस्त दृश्य ब्रह्मरूप ही हैं, श्रान्ति के आकार में परिणत हुए उसके नानाविध अज्ञान
ही दृश्यों के अनुभव हैं; यह निचोड़ अब तक के कनो से हाथ लगा यों उपहार करते हैं /
हे श्रीरामजी, जो अद्वितीय, अनादि, अविनाशी अनुभवरूप साक्षीचेतन है,वही यह दृश्य है,
इससे भिन्न दूसरा कोई भी दृश्यनाम का पदार्थ नहीं है । अनुभवैकरसरूप ब्रह्म में जो अनेक तरह
के अज्ञान हैं, वे ही चित्र-विचित्र भ्रान्तियों को पैदा कर विस्तृत दृश्यानुभवरूप बन जाते हैं