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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verses 3–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 3,4

संस्कृत श्लोक

वातस्कन्धे समाक्रान्ते ब्रह्मणा प्राणमारुते । समं गन्तुं परित्यज्य संस्थितिं क्षोभमागते ॥ ३ ॥ निराधाराः सवाताग्निदाहोल्मुकवदापतन् । व्योम्नस्तारास्तरोः पुष्पनिकरा इव भूतले ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी हेतु से ब्रह्माजी ने जब प्राणवायु रूप वातस्कन्ध का अपने में उपसंहार करना आरम्भ किया, तभी साथ-साथ उपसंहार से एक बन जाने के लिए पूर्वोक्त मर्यादा का त्यागकर ग्रह आदि में क्षोभ उत्पन्न हो गया, और क्षोभ के कारण-जैसे वायु बहने के समय अग्निदाह होने पर अगारे गिरते है, वैसे ही-निराधार होकर आकाश-मण्डल से तारे भूमि पर टूटकर गिरने लग गये, इनकी शोभा वृक्ष से गिरे फूलों की-सी प्रतीत हो रही थी