Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
निर्वासनः शान्तमना मौनी विगतचापलः ।
सर्वं कुरु यथाप्राप्तं कुरु मा वात्र किं ग्रहः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी, आप समस्त वासनाओं को छोड दीजिये, मनका सन्ताप छोडिये, व्यर्थ के
वागूजाल में मत फँसिये, अब अपनी सारी चपलताओं को तिलांजलि दे दीजिये, यह सब करके
आप जो कुछ प्रारब्धवश या शास्त्रवश प्राप्त हो जाय, उसे कीजिये या न कीजिये, इसमें किसी
तरह का कोई आग्रह नहीं है अर्थात् इसके बाद समाधि से उठकर जाग्रत-दशा में यथाप्राप्त
व्यवहारं को कीजिये या समाधि में स्थित हो कुछ न कीजिये, इसमें कोई आग्रह नहीं है