Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 65
चौसठवाँ सर्ग समाप्त पैंसठवाँ + प्ैंसठवाँ सर्ग धारणा के अभ्यास से प्राणाँ पर विजय पाकर सिद्ध हुई उस विद्याधरी के द्वारा महाराज वसिष्ठजी के प्रति "समय से मेरा वह विषयानुराग वैराग्य मेँ परिणत हो गया।
26 verse-groups
- Verse 1विद्याधरी ने कहा : महाराज, तदनन्तर दीर्घ समय बीत जानेपर मेरा वह विषय प्रेम उस प्रकार वैरा…
- Verse 2पहले तो मेने यह विचारा-मेरा स्वामी अब बूढ़ा हो गया, एकान्तमें ही उसे सदा प्रेम है, नीरस ह…
- Verse 3बाल्यकाल से ही यदि वैधव्य हो गया हो, तो वह भी अच्छा, या मरण भी अच्छा, व्याधि भी अच्छी, आप…
- Verse 4स्त्रियो का सफल जन्म ओर अविखण्डित सौभाग्य यही हे कि तरुण, रसिक और कोमल बर्ताव करनेवाला पत…
- Verse 5जिसका पति नीरस हो, वह रत्री विनष्ट ही समञ्मनी चाहिए, जो बुद्धि संस्कारयुक्त न हो, वह नष्ट…
- Verse 6वही स्त्री स्त्री है, जो अपने पति से अनुगत हो, वही श्री श्री है, जो सज्जनं से अनुगत हो तथ…
- Verse 7महाराज, यदि पति और पत्नी निरन्तर एक दूसरे के प्रति प्रेम करते हों, तो न मानसिक पीड़ा, न श…
- Verse 8विकसित फूलों के स्थान तथा नन्दन वनकी उद्यान भूमियाँ उन स्त्रियों को मरुभूमि के सदृश संताप…
- Verse 9इसलिए ज़ियों के लिए सशरी वस्तुओ का त्याग छुकर (सरल) है, परन्तु एक पति का त्याग दुष्कर है,…
- Verse 10हे मुनिश्रेष्ठ, स्थिर यौवनयुक्त मैंने अनेक वर्षों तक ये दुःख भोगे, मेरे दुर्भाग्य का विस्…
- Verse 11अथवा मेरा यह भाग्योदय ही है, इस आशय से कहती है / अनन्तर, उसी परिताप के कारण मेरे पति की ओ…
- Verse 12हे मुने, उक्त क्रम से विराग की वासनाएँ प्राप्त कर सभी पदार्थों में उन्हीं को लगा रही हूँ,…
- Verse 13इस समय में भी, जब कि आप- जैसे उपदेशकर्ता का मुझे लाभ भी हो गया है तब, में यदि विश्रान्ति…
- Verse 14सहधर्मचारिणी सियो का पति के समान ही स्वभाव रहना उचित हे / इसलिए पति के साथ में ही हमको उप…
- Verse 15हे ब्रह्मन्, उस मेरे पति का और मेरा जो अज्ञान है, उसका विनाश करने के लिए आप न्याययुक्त उ…
- Verse 16जब मेरी परवाह ही न कर मेरे पति अपनी आत्मा में अवस्थित हुए, तभी जगत् स्थिति में वैराग्य न…
- Verse 17अब धारणा के अभ्यास में दीर्य काल से स्थिति होने के कारण उपदेशग्रहण के लिए मैं पात्र हूँ य…
- Verse 18उस प्रकार धारणा से मैंने आकाश में गमन करने की सामथ्य प्राप्त कर फिर मैंने सिद्धों के साथ…
- Verse 19उसके बाद मैंने अपने वासस्थानभूत ब्रह्माण्ड के पूर्वापर घटित आकार को शास्त्र और योगदृष्टि…
- Verse 20ब्रह्मन्, तदनन्तर अपने वासस्थानभूत ब्रह्माण्ड के अन्दर की सभी वस्तुओं को देखकर बाहर निकल…
- Verse 21इससे पहले कभी भी इस ब्रह्माण्ड को मैने या मेरे पति ने नहीं देखा था, क्योकि उसे देखने की क…
- Verse 22मेरे स्वामी तो केवल वेदों के अर्थ के विचार में ही सदा मग्न रहते हैं, इससे वे यह जानते ही…
- Verse 23प्रयत्नपूर्वक) आत्मवस्तु की चाह कर रहे हैं
- Verse 24अतः हे ब्रह्मन्, आप हम लोगों की प्रार्थना को सफल करने के लिए सर्वथा समर्थ हैं, बड़े लोगो…
- Verse 25ङस अर्थ के निमित्त ठुमने दूसरे किदो से प्रार्थना क्यो नहीं की, इस पर कहती हैं / हे मानद,…
- Verse 26ङस प्रकार अपने सम्पूर्ण वृतान्त को बतनाकर शरणागत मेरी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, यों महाराज…