Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अथ क्रमेण तेनैव सरागो मे विरागताम् ।
आययौ हिमदग्धाया नलिन्या इव नीरसः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा मेरा यह भाग्योदय ही है, इस आशय से कहती है /
अनन्तर, उसी परिताप के कारण मेरे पति की ओर जो मेरा अनुराग था, वह क्रम से नीरस
होकर विराग के रूप में उस प्रकार परिवर्तित हो गया, जिस प्रकार हिम से दग्ध कमलिनी का
राग क्रमशः नीरस होकर विराग के रूप में परिवर्तित हो जाता है