Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
विद्याधर्युवाच ।
अथ कालेन महता सोऽनुरागो विरागताम् ।
प्राप्तो मम शरच्छान्तौ विरसः पल्लवो यथा ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
विद्याधरी ने कहा : महाराज, तदनन्तर दीर्घ समय बीत जानेपर मेरा वह विषय प्रेम उस प्रकार
वैराग्य में परिणत हो गया, जिस प्रकार हेमन्त ऋतु के प्रारम्भ में पल्लव रसरहित होकर विरागभाव
में परिणत हो जाता है
सर्ग सन्दर्भ
चौसठवाँ सर्ग समाप्त पैंसठवाँ + प्ैंसठवाँ सर्ग धारणा के अभ्यास से प्राणाँ पर विजय पाकर सिद्ध हुई उस विद्याधरी के द्वारा महाराज वसिष्ठजी के प्रति "समय से मेरा वह विषयानुराग वैराग्य मेँ परिणत हो गया।