Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मन्विनैव करुणाकरकारणेन सन्तो यतोऽर्थिजनवाञ्छितपूरणानि ।
कुर्वन्ति तेन शरणागततामुपेतां मामर्हसीह न तिरस्करणेन योक्तुम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
ङस प्रकार अपने सम्पूर्ण वृतान्त को बतनाकर शरणागत मेरी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, यों
महाराज वस्तिष्ठजी से प्रार्थना करती हैं /
हे ब्रह्मन्, हे करूणा के सागर, चूँकि सज्जन पुरुष किसी कारण के बिना ही अर्थी जनों की
अभिलाषाएँ पूरी कर देते हैं, इसलिए आपकी शरण में आई हुई मुझ अबलाका तिरस्कार (उपेक्षा)
आप नहीं कर सकते । उपेक्षा ही प्रार्थीजनों का तिरस्कार है