Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
संसारवासनावेशवर्जितास्मि ततोऽवसम् ।
निबध्याभिमतां तीव्रां व्योमसंचारधारणाम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
अब धारणा के अभ्यास में दीर्य काल से स्थिति होने के कारण उपदेशग्रहण के लिए मैं पात्र हूँ
यह कहती है /
जगत्स्थिति में नीरसता हो जाने से अब मैं अभीष्ट, तीव्र, आकाश में संचरण करने की
सामर्थ्यं देनेवाली खेचरी मुद्रारूप धारणा को बोधकर समस्त संसार की वासनाओं से रहित
होकर स्थित हूँ