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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 23

बाईसवाँ सर्ग समाप्त तेईसवाँ सर्ग मरुभूमि के महावन में महाराज वसिष्ठ के साथ मंकिनामक ब्राह्मण का समागम तथा वैराग्य आ जाने से तत्त्वजिज्ञासु हुए उसका उपदेश, यह वर्णन ।

41 verse-groups

  1. Verse 1(नीरसो भव भावेकु प्र्वेष॒ विभवादिषु' इससे जो कैराग्य की ढता के लिए आवश्यकता बतलाई गई है उ…
  2. Verse 2बहुत दिन पहले की बात है, प्राचीन काल में एक उत्तमव्रती मंकि नामक ब्राह्मण हुए थे, हे श्री…
  3. Verse 3किसी समय पहले आपके पितामह अज ने किसी यज्ञादि रूप कार्य से मुझे निमन्त्रण दिया था, इसलिए आ…
  4. Verse 4आपके पितामह की नगरी अयोध्या में आ रहा मैं पृथिवी पर विचरते हुए महान्‌ आतपों से युक्त किसी…
  5. Verse 5हे श्रीरामचन्द्रजी, वह महाजंगल अविच्छिन्नरूप से धूलि उड़ने के कारण धूसर हो रहा था, वहाँ प…
  6. Verse 6धूलि आदि के उड़ने से अक्षुब्ध हुए आकाश, झंझावात, धूप, मृगतृष्णा के जल और तप्त हुई पृथिवी…
  7. Verse 7मोह पैदा करनेवाली मृगतृष्णा-सी अविद्या के सदृश, भ्रम के कारण जडता को प्राप्त, बहुत दूर तक…
  8. Verse 8उस महाजंगल में पहुँचने के बाद ज्यों ही मैं इधर-उधर विहार करने में प्रवृत्त हो रहा था, त्य…
  9. Verse 9वह पथिक कह रहा था : अहो, जैसे दुर्जन पापी का समागम परिताप के लिए ही होता है वैसे ही प्रचण…
  10. Verse 10सभी अंग एक तरह से गलते जा रहे हैं, इस ताप में मानों अग्नि प्रदीप्त हो रही है तथा संकुचित…
  11. Verse 11इसलिए छोटे-से इस अगले गाँव में प्रविष्ट होकर कुछ देर तक रहूँ । यहीं पर जल्दी थकावट मिटाकर…
  12. Verse 12ऐसा विचारकर जब वह आगे स्थित किराता के एक छोटे-से गाँव में प्रवेश करने की इच्छा कर रहा था,…
  13. Verse 13हे अकिंचन पुरुषों के संचारयोग्य मार्ग का परिज्ञान न रखनेवाले मरुमार्ग के, महाजंगल के पथिक…
  14. Verse 14हे निम्नमार्ग के पथिक (८) पूर्व के गाँवों में अनन-पान-आश्रय आदि के लाभ द्वारा कुछ विश्रान…
  15. Verse 15पामरजनों के निवासस्थान गाँव में (::0) विश्रान्तिसुख नहीं मिलता । हे श्रीरामजी, यह निश्चित…
  16. Verse 16ये सब पुलिन्द जाति के जन्तु लोग जंगली एक छोटे-से गाँव में रहते हैं, जनपद के स्पन्द से बहु…
  17. Verse 17पत्थर की बनी मूर्तियों की नाई वे विचारों में स्फ्रित नहीं होते यानी मूढ़ होते हैं, अनुभूत…
  18. Verse 18काम और अर्थ में ही इनका सम्पूर्णं पौरुष परिनिष्ठित रहता है तथा मुग्ध बुद्धि वे आपातरमणीय…
  19. Verse 19दोनों कुल की (=) अर्थात्‌ मैंने उसका भाग्योदयकाल जानकर उसके सम्पूर्ण श्रम का मूलोच्छेद कर…
  20. Verse 20अन्धकारावृत गुहा में अजगर होना अच्छा है, पत्थर के भीतर कीट होना अच्छा है तथा मरुस्थल में…
  21. Verse 21निमेषमात्र के लिए आस्वाद मे मधुर, क्षणभर में ही बिगाड़ कर देनेवाले तथा प्राण लेने में सदा…
  22. Verse 22धुलिधूसर, तृण, पर्णं तथा वन में व्यग्र गाँव में होनेवाले ये अधार्मिक जनरूपी पवन जीर्ण-शीर…
  23. Verse 23हे अनघ श्रीरामजी, इस तरह मेरे कहने के बाद मेरा आशय जानकर “ये मेरा अवश्य उद्धार करेंगे” इस…
  24. Verse 24उस पथिक ने कहा : भगवन्‌, आप कौन हैं ? आप पूर्णात्मा आत्मज्ञानी कोई महात्मा प्रतीत हो रहे…
  25. Verse 25पूर्णात्मा को ही हेतुओं के वित्त द्वारा प्रकट करते है/ भगवान्‌ क्या आपने अमृत का पान किया…
  26. Verse 26सांसारिक दोष दुःखों से शून्य हैँ, निरतिशयानन्द होने से आप जीवन्मुकतों के गुणों से परिपूर्…
  27. Verse 27इस प्रकार का में हूँ. यह तुमने कैसे जाना, यदि यह कहिये, तो इसका उत्तर यह है कि आपके रूप क…
  28. Verse 28आप पृथिवी पर स्थित हुए भी समस्त लोकों के ऊपर आकाश में स्थित-से हैं । आस्थाशून्य रहते हुए…
  29. Verse 29चन्द्रमा की नाई विशुद्ध आपका अमृतमय मन चन्द्रमा की किरणों की तरह पदार्थो में प्रसृत नहीं…
  30. Verse 30ओर दूसरा भी चन्द्रमा के साथ साम्य तथा विशेषता बतलाते हैं । मुने, आप कलावान्‌, कलंकशून्य,…
  31. Verse 31इसी तरह हिरण्यगर्भ के साथ आपका साट्रश्य तथा उस्रस़े बढ़कर आपमें विशेष गुण हैं, यह कहते है…
  32. Verses 32–33इस तरह प्रशसा द्वारा अभियुख किये गये महाराज वस्तिष्ठजी को अपनी वैराग्य आदि स्राधनम्रम्पत्…
  33. Verse 34हे मुने, इस ब्रह्माण्ड के उदर में बिजली की चमक के समान क्षणभंगुर भूतो को देखकर विरक्तमन म…
  34. Verse 35भगवन्‌, इस दीन के ऊपर दया करके अपना नाम, गोत्र आदि कथनपूर्वक ठीक-ठीक इसे परिचय दीजिये (<)…
  35. Verse 36अपने दर्शन से ही मित्र बना लेनेवाले (आपके सदृश) महात्माओं के सामने सभी प्राणी, कमलों की न…
  36. Verses 37–38कुछ विवेकसम्पन्न हुआ भी मेरा यह मन अज्ञानजनित प्रबल सन्देह बना रहने से बिना गुरुउपदेश के…
  37. Verse 39महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे महाबुद्धे, मैं ब्रह्मलोकवासी वसिष्ठमुनि हूँ | राजर्षिं अज के…
  38. Verse 40मैं मनीकियों के रास्ते पर आ ग्या हूँ. इसमे क्ौन-ग्रा मेरा परिचायक चिह्न है 2 इस फर कहते ह…
  39. Verse 41जैसे धीरे-धीरे शाणपर घिसने से मणि निर्मलरूपता को प्राप्त होती है वैसे ही काषायों के परिपा…
  40. Verse 42हे विप्र, तुम क्या जानना चाहते हो और कैसे संसार को छोड़ना चाहते हो, क्योकि शिष्य गुरु से…
  41. Verse 43चूँकि शिष्य रागादिमलशून्य वासना से युक्त रहता है, इसीलिए वह उत्तम वैराग्य आदि तीन साधनों…