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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

विमलवासन उत्तममानसः परिविविक्तमतिर्जनतेजसा । पदमशोकमलं खलु युज्यते जनितितीर्षुमतेरिदमुच्यते ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

चूँकि शिष्य रागादिमलशून्य वासना से युक्त रहता है, इसीलिए वह उत्तम वैराग्य आदि तीन साधनों से सम्पन्न मानस तथा नित्यअनित्य एवं सारअसार के विवेक में निपुण मति युक्त होता है । वही गुरुजनों के उपदेशरूपी तेज से शोकशून्य आत्मतत्त्व पद प्राप्त करने के योग्य है, दूसरा नहीं । इसलिए जन्मादि सम्पूर्ण दुःखों से तैर जाने की इच्छायुक्त बुद्धिवाले तुमसे सम्भाषण आदि करके मैंने अच्छी तरह समझ लिया है कि तुम मेरे उपदेश के अधिकारी अवश्य हो, इसीलिए मैं तुमसे कहता हू । अतः तुम अपना पूर्वोत्तर वृत्तान्त मुञ्जसे बतलाओ