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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

ममेदं च मनो मोहात्संसारभ्रमसंभवम् । मन्ये हातुं न समर्थं स त्वं बोधानुकम्पितैः ॥ ३७ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । वसिष्ठोऽस्मि महाबुद्धे मुनिरस्मि नभोगृहः । केनाप्यर्थेन राजर्षेरिमं मार्गमुपस्थितः ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

कुछ विवेकसम्पन्न हुआ भी मेरा यह मन अज्ञानजनित प्रबल सन्देह बना रहने से बिना गुरुउपदेश के सिर्फ एकमात्र अपने विचारकौशल से संसार के भ्रम से उत्पन्न दुःख को समूल नष्ट करने में समर्थ नहीं है, यह मैंने बार-बार मनन करके निश्चय कर लिया, इसलिए पूर्ववर्णित मेरा उद्धार करने में सामर्थ्य रखनेवाले आप रहस्यज्ञान के अनुकूल उपदेश की अनुकम्पाओं से मोहजनित मेरे संशयों का उच्छेद कर दुःखनाश करने योग्य इस मेरे मन को बना दीजिये