Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
किं ज्ञातुमिच्छसि कथं संसारं हातुमिच्छसि ।
उपदिष्टमहं मन्ये संपादयति कर्मभिः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे विप्र,
तुम क्या जानना चाहते हो और कैसे संसार को छोड़ना चाहते हो, क्योकि शिष्य गुरु से उपदिष्ट
अर्थ को बार-बार परिशीलन करके ज्ञातांश को फिर प्रश्नावधारण आदि कर्मों से चूँकि सफल
बनाता है, वह मैं समझता हूँ, अतः तुम्हें जो अपना अज्ञात और जिज्ञासितांश हो, वह कहो