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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

अविद्यामिव संमोहमृगतृष्णां गतां भ्रमात् । जडतामाततां शून्यां दिङ्मोहमिहिकाकुलाम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

मोह पैदा करनेवाली मृगतृष्णा-सी अविद्या के सदृश, भ्रम के कारण जडता को प्राप्त, बहुत दूर तक फैला हुआ, प्राणियों के संचार से शून्य तथा दिग्भ्रमरूपी कुहरा से वह व्याप्त था