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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

प्रसृतं न पदार्थेषु न पदार्थात्मनाऽस्ति वै । तवेन्दोरिव शुद्धस्य मनोऽमृतमयं स्थितम् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमा की नाई विशुद्ध आपका अमृतमय मन चन्द्रमा की किरणों की तरह पदार्थो में प्रसृत नहीं है ओर न ओषधि, वनस्पति, सोम, घी, दूध, अन्न आदि पदार्थो के रूप से उपभोग के योग्य (7) अज्ञानीजन का - यह तात्पर्यार्थ है । (७) इसमें यह श्रुति प्रमाण है -“रूपमेवास्यैतन्महिमानं व्याचष्टे" । हैं जिससे नष्ट हो जायेगा । अतः आपका मन सदा ही परिपूर्णं स्थित है । तात्पर्य यह कि चन्द्रमा से भी बढ़कर आपका मन है