Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 213
को सौ ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त दो सौ बारहवाँ सर्ग ब्रह्म की अहंभाव कल्पना हिरण्यगर्भ हैउसका संकल्पमय यह त्रिजगत् है, इसलिए यह ब्रह्म ही है, यह वर्णन ।
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- Verse 1ब्रह्म में पहले समष्टि-अहंकाररूप हिरण्यगर्भ की-सी कल्पना हुई, तदनन्तर उसके उदर में व्यष्ट…
- Verse 2केवल माया के इतने से अपराध से ब्रह्म अब्रह्म नहीं हो सकता अतएव हिरण्यगर्भ आदि कुछ भी अन्य…
- Verse 3यदि हिरण्यगर्भ आदि कुछ भी नहीं था, तो वह संवित् में कैसे स्फुरित होता है ? इस प्रश्न पर…
- Verse 4सृष्टिकाल से लेकर शून्य यह भ्रान्ति उदित हुई है अथवा वह भी उदित नहीं हुई है। भ्रान्ति कर…
- Verse 5द्वित्व (भेद) है ? और जब द्विता का अभाव है तब एकता कहाँ ? क्योंकि एकता द्वित्व की अपेक्षा…
- Verses 6–7अखण्ड परमशान्त वह ब्रह्मचित् होने के कारण (परस्फुरणस्वभाववश) अहम्' यों अहंकारसमष्टिरूपत…
- Verse 8यदि आप स्वरूपचैतन्य ही अर्थ के समान स्फुरित होता है यह कहते हैं, तो वह तो सदा ही है इसलिए…
- Verses 9–10ठीक है, युक्तिद्रष्टि से ब्रह्म सदा ही अहम्” आदि तथा निज तत्त्व को चेतता है। तमी तो सृष्…
- Verse 11तब विद्या-अविद्या-मिश्रदृष्टि में ब्रह्म कैसा चेतता है ? इस पर कहते हैं। जैसे पवन और स्पन…
- Verse 12चूँकि जगत् निर्विकार आदि-अन्त शून्य ब्रह्मरूप ही है, इसलिए जगत् की सदा ही ऐसी ही सत्ता…
- Verses 13–14इस मिश्रदुष्टि को भी आप अपने बोध की अनुवृत्ति तक ही शब्द श्रवण इत्यादि आदि व्यवहार की सिद…
- Verse 15हे श्रीरामचन्द्रजी, बद्ध की दृष्टि से ब्रह्म सदा त्रिभुवन- सा ही भासता है मुक्त की दृष्टि…
- Verse 16जैसे आकाश से वृक्ष, पर्वत आदि कदापि उत्पन्न नहीं होते वैसे ही ब्रह्म से जगत् उत्पन्न नही…
- Verses 17–18जब तक उपदेश श्रवण में प्रवृत्ति है तभी तक मैंने मिश्रद्ृष्टि को स्वीकार किया है, ऐसा कहते…
- Verses 19–20श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, 'एतद्ब्रह्मन् कदा नाम' इत्यादि जो मैंने आपसे प्रश्न किय…
- Verse 21श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इस परमपद में अहंकार का स्फुरण होने पर उसमें आ…
- Verse 22अहंकाराध्यास परिच्छेदाध्यास का कारण है, यह दशति है । जब आत्मा को देह आदि में 'अहम्” का भ…
- Verses 23–25तदुपरान्त परस्पर व्यावृत्ति करनेवाले जाति, गुण, क्रिया आदि प्रवृत्ति निमित्तो के भेद की क…
- Verses 26–50एक, अविनाशी ब्रह्म ही जीव कल्पना की सी भावना कर (जीवभाव का अध्यास कर) आवरणशून्य जीवसाक्षी…