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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verses 17–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 17, 18

संस्कृत श्लोक

शिष्य उवाच । किमिदं भाति भगवन्न विभाति च किं पुनः । कस्येदं वस्तुनो रूपं चिद्व्योम्नो वितताकृतेः ॥ १७ ॥ गुरुरुवाच । चिदाकाशमिदं पुत्र स्वच्छं कचकचायते । यन्नाम तज्जगद्भाति जगदन्यन्न विद्यते ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

जब तक उपदेश श्रवण में प्रवृत्ति है तभी तक मैंने मिश्रद्ृष्टि को स्वीकार किया है, ऐसा कहते हैं। यदि सन्देह के अवसर पर उपदेश्य के उपदेश के लिए अल्पमति बनकर जब तक आपको ज्ञानप्राप्ति न हो तब तक भेद मानते हो तो मानों इसमें कोई हानि नहीं हे । प्रबुद्ध तत्त्वज्ञानी होने पर ब्रह्मरूप हुए आपके लिए न शास्त्र आदि है, न शब्दबुद्धि है तथा अहंकार और उसके संकल्प जगद्रूप प्रजापति की यह भेदबुद्धि तथा बुद्धि भी आपको न होगी या कुछ भेदबुद्धि शान्त हो जायेगी