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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यथा यत्पृष्टवानद्य त्वं मामरिनिषूदन । शिष्येणैव सता पूर्वमहं पृष्टो गुरुस्त्वया ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म में पहले समष्टि-अहंकाररूप हिरण्यगर्भ की-सी कल्पना हुई, तदनन्तर उसके उदर में व्यष्टिजीव जगत्‌ की कल्पना हुई, इसलिए समस्त जगत्‌ ब्रह्मविवर्तमात्र ही है। यह आपातदर्शन से (स्थूल दृष्टि से) सिद्ध है किन्तु परमार्थ दृष्टि से न हिरण्यगर्भ है, न जीव है अथवा न जगत्‌ ही है केवल नित्य निर्मल सच्चिदानन्दैकरस पूर्ण ब्रह्म ही स्थित है, यों सकल वेदान्तो के निर्गलित (निचोडरूप) अर्थ का प्रतिपादन करने के लिए प्रस्तुत होते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, ब्रह्माकाश चित्‌ होने से स्वयं ही पहले “में अहंकार समष्टिरूप हिरण्यगर्भ हूँ” यों अपने को जानता-सा है उसका वैसा स्फुरणरूप वेदन ही परमेष्ठिरूपता यानी हिरण्यगर्भता है। उस हिरण्यगर्भ का संकल्प यह त्रिजगत्‌ है

सर्ग सन्दर्भ

को सौ ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त दो सौ बारहवाँ सर्ग ब्रह्म की अहंभाव कल्पना हिरण्यगर्भ हैउसका संकल्पमय यह त्रिजगत्‌ है, इसलिए यह ब्रह्म ही है, यह वर्णन ।