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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verses 9–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

शिष्यते हि चिदाकाशमव्ययस्यानुमीयते । तत्कालशेषतानेन सर्गानुभवहेतुना ॥ ९ ॥ शिष्य उवाच । नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । इदं तत्कथमाभोगि विद्यमानं क्व गच्छति ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

ठीक है, युक्तिद्रष्टि से ब्रह्म सदा ही अहम्‌” आदि तथा निज तत्त्व को चेतता है। तमी तो सृष्टि और असृष्टि-दोनों रूप दोनों ब्रह्मदृष्टियों मे प्रमाणसिद्ध होते हैं । तथापि दोनों दृष्टिर्यो में विषय की सत्ता और असत्ता से उत्पन्न महान्‌ अन्तर है, इसलिए प्रमाण्य से वे तुल्य नहीं हैं इस आशय से स्वीकार कर उत्तर देते हैं। इस प्रकार यह ब्रह्म सदा ही इस स्वरूपस्फुरण तथा अहमादि अहंकार समष्टि को चेतता है, क्योंकि अनादि अजन्मा चिन्मात्र को स्वरूप चैतन्य से (विद्या से) स्वरूपस्फूर्ति में और अविद्या से अहम्‌ आदि के स्फुरण में दूसरे की कोई अपेक्षा नहीं है। सर्ग ओर असर्ग आकाशरूप ब्रह्म सर्वत्र और सर्वदा है। अविद्या दृष्टि से यह (ब्रह्म) कदापि ज्ञात नहीं होता और विद्या दृष्टि से यह (सर्ग) कुछ नहीं हैं