Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यथा स्वप्ने सुषुप्ते च निद्रैकैवाक्षयानिशम् ।
सर्गेऽस्मिन्प्रलये चैव ब्रह्मैकं चितिरव्ययम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
अहंकाराध्यास परिच्छेदाध्यास का कारण है, यह दशति है ।
जब आत्मा को देह आदि में 'अहम्” का भान होता है, तब देह से शून्य स्थल में यहाँ पर मैं नहीं हूँ,
इसका भी अवश्य भान होता हे । यह देशकृत परिच्छेद है । इसी रीति से स्वात्मा ही नाना प्रकार का
परिच्छेद यानी कालकृत परिच्छेद और वस्तुकृत परिच्छेद बिना क्रम के द्वैतरूप होकर आकाश में
उदित होता है