Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verses 6–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 6,7
संस्कृत श्लोक
निर्विशेषेण नश्यन्ति भुवः शैला दिशो दश ।
क्रिया कालः क्रमश्चैव न किंचिदवशिष्यते ॥ ६ ॥
नश्यन्ति सर्वभूतानि व्योमापि परिणश्यति ।
स सर्वजगदाभासमुपलब्धुरसंभवात् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
अखण्ड परमशान्त वह ब्रह्मचित् होने के कारण (परस्फुरणस्वभाववश) अहम्' यों
अहंकारसमष्टिरूपता को (हिरण्यगर्भता को) जानता हुआ वैसे ही अपने को अर्थ सा चेतता है जैसे कि
विस्तृत आकाश अपने अन्दर स्थित अपनी शून्यता को जानता है । जैसे पवन अपने अन्दर स्थित
अपने स्पन्दन को जानता है, जैसे अग्नि अपने अन्दर स्थित अपनी उष्णता को जानती है और जैसे
पूर्णन्दु (पूर्ण चन्द्र) अपने अन्दर स्थित अपनी शीतलता को जानता है वैसे ही ब्रह्म अपनी सत्ता को
अर्थ सा जानता हे