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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verses 13–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

क्व स्थितं मृगतृष्णाम्बु क्व स्थिरो द्वीन्दुविभ्रमः । क्व स्थिरा केशदृग्व्योम्नि क्व भ्रान्त्यनुभवः स्थिरः ॥ १३ ॥ सर्वं दृश्यमिदं पुत्र भ्रान्तिमात्रमसन्मयम् । स्वप्ने पुरमिवाभाति कथमेतन्न शाम्यति ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस मिश्रदुष्टि को भी आप अपने बोध की अनुवृत्ति तक ही शब्द श्रवण इत्यादि आदि व्यवहार की सिद्धि के लिए स्वीकार करते हैं, तो स्वीकार कीजिये पर परमार्थरूप से स्वीकार मत कीजिये, ऐसा कहते हैं। यद्यपि आपको यह अद्वितीय ब्रह्मबोध प्राप्त हो चुका है फिर भी अज्ञान को स्वीकार कर मेरे उपदेश शब्दश्रवण में आसक्तचित्त हो आप मिश्रदृष्टि से प्राप्त देत को (सप्रपंचनिष्प्रपंचरूपता को) स्वीकार करते हो तत्त्व दृष्टि से कदापि नहीं करते | मिश्रदृष्टि में तो ब्रह्म सर्वात्मक है, उसके अन्तर्गत कोई जीव जो कुछ चेतता है तो वह उस जीव से अभिन्नरूप ब्रह्म ही चेतता है, यो उसके रूप से सब कुछ चेतता है। किन्तु निर्विशेष ब्रह्मरूप से कोई कुछ भी कभी नहीं चेतता हे, क्योकि उससे अन्यस्वरूपवाला कोई नहीं है अतः कदाचित्‌ नहीं चेतता