Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verses 23–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, verses 23–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 23-25
संस्कृत श्लोक
यथा स्वप्ने जगद्द्रष्टुः शान्तं शाम्यत्यशेषतः ।
तद्वदस्मज्जगदिदं शान्तं शाम्यत्यशेषतः ॥ २३ ॥
तदन्यत्रास्ति खे खाख्यं तथेत्यङ्ग न विद्महे ।
अशङ्क्यं परखे त्वेतदस्मच्चिद्व्योम्नि संभवात् ॥ २४ ॥
यथेहास्मच्चिदाकाशकचनं सर्गसंक्षये ।
तथान्यत्संविदाकाशं नैवमित्यत्र का प्रमा ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त परस्पर व्यावृत्ति करनेवाले जाति, गुण, क्रिया आदि प्रवृत्ति निमित्तो के भेद की कल्पना
से उत्पन्न नामभेदाध्यास होता है ऐसा कहते हैं।
तदनन्तर इन व्योमात्मक (चिदाकाशमय) पदार्थभेद सत्ताओं के परस्पर भेदक जाति, गुण, क्रिया
आदि प्रवृत्ति निमित्त के भेद से नामबुद्धि यानी वाचक शब्दों का अध्यास होता है, पर वास्तव में यह सब
चिदाकाश ही है। इस प्रकार निराकार इस परम पदमें अहंभाव से देश, काल आदि की कल्पनाओं के
सिद्ध होने पर यानी उस परम पद के देश, काल कल्पनारूप होने पर जो यह दृश्य नामका प्रकाशरूप
वेदन भासता है उसमें अहंभाव से जीव-साक्षिचित् में आवरण के अभाव से सर्वत्र स्वाभाविक चित् की
अभिव्यक्ति होने से तत्-तत् स्थान में जगत् के आकार से ब्रह्म ही अब्रह्मरूप से (संसाररूप से)
विराजमान होता हे