Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मविष्ण्विन्द्ररुद्राद्या ये हि कारणकारणम् ।
तेषामप्यतिकल्पान्ते नामापीह न विद्यते ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि आप स्वरूपचैतन्य ही अर्थ के समान स्फुरित होता है यह कहते हैं, तो वह तो सदा ही है
इसलिए इस समय सृष्टि के आरम्भ काल से स्फुरित होता है यह क्यों कहते हैं, यों श्रीरामचन्द्रजी प्रश्न
करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, इसने अहम् आदि का कब चेत नहीं किया, क्योकि यह सदा ही
आवरणरहित आदि-अन्त शून्य ओर नित्य हे । यह इस समय यानी सृष्टिकाल से लेकर चेतता है, ऐसा
आपने केसे कहा ?