Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verses 19–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
अस्यैतद्वस्तुनो रूपं चिद्व्योम्नो वितताकृतेः ।
रूपमत्यजदेवाच्छं यदित्थमवभासते ॥ १९ ॥
कचनाकचनं सर्गक्षयात्मास्य निजं वपुः ।
व्योमात्म शुक्लकृष्णं स्याद्यथावयविनो वपुः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी
ने कहा : भगवन्, 'एतद्ब्रह्मन् कदा नाम' इत्यादि जो मैंने आपसे प्रश्न किया था उसका हल मैं आपकी
उक्ति से पा चुका अब आप कृपा करके प्रस्तुत समष्टि अहंकार आदि के अध्यास का निरूपण कीजिये
जिसका कि आपने मेरे बोध के लिए पहले प्रस्ताव किया था। उस परम पद में अहंकार के चेतित होने पर
आगे क्या होता है ? आप सर्वज्ञ होने से सब कुछ जान चुके हैं और मैं आपके उपदेश के श्रवण में
लालायित हूँ, अतः मुझे तृप्ति नहीं होती