Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 200
एक सौ अठानबेवाँ सर्ग समाप्त एक सौ निन्यानवे सर्ग यद्यपि जीवन्मुक्त पुरुषों का न तो कर्मो के अनुष्ठान से कोई प्रयोजन है और न कर्मो के अनाचरण से कोई क्षति है तथापि वे सत्कर्म का (सदाचरणोका) अनुवर्तन करते हैं, यह वर्णन |
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- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिवर, जीवन्मुक्त पुरुष नित्य एकमात्र ज्ञान में तल्लीन रहते…
- Verse 2खूब अभ्यस्त कर्म करने मे मुक्त पुरुषों को कोई श्रम नहीं होता और कर्मत्याग का कोई प्रयोजन…
- Verse 3जो ज्ञानी को कष्टप्रद हो ऐसी हेय वस्तु यहाँ नहीं है तथा जो तत्त्वज्ञानी का संश्रयणीय हो य…
- Verse 4ज्ञानी पुरुष का न तो कर्म-त्याग से कोई प्रयोजन है और न कर्मो के आश्रय से कोई प्रयोजन है ।…
- Verse 5जीवित-शरीर में चेष्टा होना अवश्यम्भावी होने पर खूब अभ्यस्त सदाचाररूप चेष्टा ही उसके शरीर…
- Verse 6जैसे अपना घर निर्दोष है तो अन्य जगह बैठने की क्या आवश्यकता है वैसे ही अन्यत्र अन्य कोई न…
- Verse 7हे श्रीरामचन्द्रजी, विषमतारूप दोष से निर्मुक्त निर्विकार स्वच्छ बुद्धि से जो कार्य निरन्त…
- Verses 8–17यद्यपि कर्मो में प्रवृत्त हुए लोगों को द्रव्योपार्जन, ऋत्विजो को प्रसन्न करना आदि तथा अनु…
- Verses 18–22महानगरी काशी में, परम पावन तीर्थराज प्रयाग में, सिद्धपुरुषों के निवासभूत श्रीपर्वत तथा बद…
- Verse 23उनमें कुछ लोगों ने संन्यास विधि से अपने पूर्वाश्रम के आचार का परित्याग कर दिया है और कोई…
- Verse 24कोई स्वदेश रहित हैं, किन्हीं ने विक्षेपनिवृत्ति के लिए अपने घर- द्वार का त्याग कर दिया है…
- Verses 25–28स्वर्ग आदि उर्ध्व लोको और पातालादि अधोलोकों में भी देव, दैत्य आदि जीवन्मुक्त बहुत हैं, इस…
- Verse 29हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार इस विपुल जनसमुदाय में जन्ममरणरूप संसार से छुटकारा पाने की इ…
- Verses 30–31तो क्या उनके द्वारा अनुष्ठित वनवास आदि भी संसार को पार कर जाने में कारण हैं ? इस शंका पर…
- Verses 32–34संसार से छुटाकारा पाने का एकमात्र हेतु तत्त्वज्ञानरूप स्वभाव यथार्थरूप से स्थित है । उक्त…
- Verses 35–38अतएव जीवन्मुक्त को शुभ अशुभ कर्म करने पर भी अनासक्तिवश ही उनका स्पर्श नहीं होता है, ऐसा क…
- Verses 39–40हे महात्मन्, हे श्रीरामचन्द्रजी, जिसे परमार्थ तत्त्व का ज्ञान प्राप्त हो चुका, रागादि दो…
- Verse 41हे सौभाग्यशाली राघव, आपके ज्ञानवोधन के लिए इससे भिन्न शुभ उपदेशयोग्य कुछ नहीं है, क्योकि…
- Verses 42–66श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ श्रीवसिष्ठजी यह अन्त में कहकर श्रीरामचन्द्रजी के निर्…