Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verses 18–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, verses 18–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 18-22
संस्कृत श्लोक
सिद्धा ऊचुः ।
आकल्पं सिद्धसङ्घेषु मोक्षोपायाः सहस्रशः ।
व्याख्याताश्च श्रुताश्चालमीदृशास्तु न केचन ॥ १८ ॥
तिर्यञ्चो वनिता वाला व्यालाश्चानेन निर्वृतिम् ।
मुनेर्वाक्यविलासेन यान्ति नास्त्यत्र संशयः ॥ १९ ॥
दृष्टान्तैर्हेतुभिर्युक्त्या यथा रामोऽवबोधितः ।
तथा चारुन्धती साक्षात्संबोधयति वा न वा ॥ २० ॥
अनेन मोक्षोपायेन तिर्यञ्चोऽपि गतामयाः ।
स्थिता मुक्ता भविष्यन्ति के नाम भुवि नो नराः ॥ २१ ॥
श्रवणाञ्जलिभिः पीत्वा ज्ञानामृतमिदं वयम् ।
परां पूर्णनवीभूतसिद्धयः श्रियमागताः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
महानगरी
काशी में, परम पावन तीर्थराज प्रयाग में, सिद्धपुरुषों के निवासभूत श्रीपर्वत तथा बदरिकाश्रम मे,
महापवित्र शालग्राम में, पवित्रतम मथुरा नगरी में, कालंजर पर्वत पर, महेन्द्रवन की झाड़ियों मे, गन्धमादन
पर्वत की चोटियों पर, दर्दुर पर्वत के शिखरो पर, सह्य पर्वत की वनभूमि में, विन्ध्याचल के जलप्राय
प्रदेशो मे, मलयाचल के मध्य में, कैलाश पर्वत के वनों मे, ऋक्षवान् पर्वत की गुफाओं मे इन तथा
(४६) बन्धुबान्धवों के समागम में नाना प्रकार के रागद्वेष आदि विक्षेपो की प्राप्ति होती है, उनके
परित्याग के लिए ।
अन्यान्य तपोवनों में, मुनिजनों के आश्रमों में विविध प्रारब्धभोगानुकूल दृष्टिवाले बहुत से तपस्वी
निवास करते हैं