Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verses 35–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, verses 35–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 35-38
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
प्रणाममात्रसंतुष्टा ब्राह्मणा भूपते वयम् ।
प्रणामेनैव तुष्यामः स एव भवता कृतः ॥ ३५ ॥
पातुं त्वमेव जानासि राज्यं भाति तवैव च ।
भवत्वेतत्तवैवेह ब्राह्मणाः क्व महीभृतः ॥ ३६ ॥
दशरथ उवाच ।
कियन्मात्रं तु राज्यं स्यादिति लज्जामहे मुने ।
प्रकर्षेणात्र तेनेश यथा जानासि तत्कुरु ॥ ३७ ॥
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्तवति भूपाले रामः पुष्पाञ्जलिं ददत् ।
उवाच प्रणतो वाक्यं पुरस्तस्य महागुरोः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव जीवन्मुक्त को शुभ अशुभ कर्म करने पर भी अनासक्तिवश ही उनका स्पर्श नहीं होता है,
ऐसा कहते हैं।
जिसका मन आसक्तिरहित है ऐसा मुनि नित्य शुभ और अशुभ करता हुआ और उनका परिहार
करता हुआ भी संसार में नहीं आता | जिसने अपना मन विषयों में छोड़ दिया है ऐसा शठ दुर्मति पुरुष
शुभ-अशुभ कर्मो का आचरण न करता हुआ भी संसारसमुद्र में अवश्य ही निमग्न होता है ॥३ ३, ३ ४॥
यदि कोई शंका करे कि ऐसी अवस्था में मन को ही विषयों से हटाइये और मारिये, तत्त्व से क्या
प्रयोजन है ? तो इस पर कहते हैं।
जिसने विषयों का स्वाद चख लिया ऐसी मति, जो अत्यन्त दुःखदायिनी है, शहद के घड़े में
फँसी हुई मधुमक्खी की तरह न तो हटाई जा सकती है और न मारी जा सकती है। कभी भाग्यवश
साधनचतुष्टय की प्राप्ति होनेपर काकतालीययोग से अपने चित्त की श्रवण आदि उपायों द्वारा
आत्मा के अवलोकन में (आत्मसाक्षात्कार में) स्वयं ही प्रवृत्ति हो जाती हे । आत्मसाक्षात्कार होने
पर निर्मलता को प्राप्त हुआ चित्त अवलोकन से तत्त्व पाकर निर्द्धन्द्र अतएव अनासक्त ओर अनामय
ब्रह्म ही हो जाता है । अचित्तता को प्राप्त हुए सत्त्वरूप चित्त से सम होकर आप पराकाशरूप
(ब्रह्माकाश रूप) जो चित्त आदि सकल प्रपंच का अधिष्ठानांश है तद्रूप बनकर सुखपूर्वक स्थित
होइये