Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
झटित्येवाम्बरहृता पूर्वमुक्तधियां मुखात् ।
सिद्धानां साधुवादेन व्योमकोटरवासिनाम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी पुरुष का न तो कर्म-त्याग से कोई प्रयोजन
है और न कर्मो के आश्रय से कोई प्रयोजन है । जो-जो वर्ण और आश्रम के उचितरूप से जैसे स्थित है
उसको वह वैसे ही करता है