Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verses 25–28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, verses 25–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 25-28
संस्कृत श्लोक
पारिजातप्रसूनाढ्यमहीतलविराजिताम् ।
संतानकमहाम्भोदव्याप्तसभ्यशिरःकराम् ॥ २५ ॥
मौलिरत्नविटंकाग्रविश्रान्तहरिचन्दनाम् ।
वारिपूरप्रलम्बाभ्रवदालम्बिवितानकाम् ॥ २६ ॥
इति पश्यन्सभां लोकः साधुवादेन भूरिणा ।
तत्कालोचितवाक्येन तेन तेन तथोद्यतः ॥ २७ ॥
वसिष्ठं पूजयामास सर्वेन्द्रियगणानतः ।
कुसुमाञ्जलिमिश्रेण प्रणामसहितेन च ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वर्ग आदि उर्ध्व लोको और पातालादि अधोलोकों में भी देव, दैत्य आदि जीवन्मुक्त बहुत हैं, इस
आशय से कहते हैं।
है महामति रामजी, आकाश में निवास करनेवाले देव आदि तथा पाताल में रहनेवालें दानव आदि
इन महात्माओं में से कोई लोक रहस्य को जाननेवाले तथा यथार्थ दर्शन से निर्मल तथा परतत्त्व का
साक्षात्कार कर चुके प्रबुद्धमति हैं । कोई अप्रबुद्धबुद्धिवाले अतएव सन्देहवश झूले के समान कभी इस
पक्ष में तो कभी दूसरे पक्ष में आन्दोलित चित्तवाले पापाचरण से निवृत्त होकर सज्जन पुरुषों के चरणचिहों
का अनुसरण करते हुए स्थित हैं । कोई अर्द्धप्रबुद्धमतिवाले “में तत्त्वज्ञानी हूँ, निषिद्धाचरण मेरा क्या
बिगाड़ सकता है” इस अभिमान से सदाचार का परित्याग कर उभयमश्रष्ट हुए हैँ