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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verses 39–40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, verses 39–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 39,40

संस्कृत श्लोक

निरुत्तरीकृतमहाराज ब्रह्मन्प्रणौमि ते । प्रणाममात्रसारोऽहं रामः पादाविमौ प्रभो ॥ ३९ ॥ इत्युक्त्वा पादयोस्तस्य शिरोवन्दनपूर्वकम् । तत्याजाञ्जलिपुष्पाणि हिमानीव वनं गिरेः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

हे महात्मन्‌, हे श्रीरामचन्द्रजी, जिसे परमार्थ तत्त्व का ज्ञान प्राप्त हो चुका, रागादि दोषों का जो त्याग कर चुके हैं, जिसमें आत्मज्ञान उदित हो चुका ऐसे आप समबुद्धि, शोक रहित महात्मा होकर निःशंक रहिये | क्योकि जन्म-मृत्युशून्य परम पवित्र वह ब्रह्मपद आप ही हैँ । विमल ब्रह्मरूप जगत्‌ में प्रकृतिरूप, मलरूप, विकाररूप, उपाधिरूप, उसका बोधरूप, उसकी इच्छा, प्रयत्न, हानि, उपादान और भोगादिरूप कुछ भी कहीं नहीं है । किन्तु वह स्पष्ट ही अकृत्रिम चैतन्यधाम ब्रह्म ही है, इसलिए आप अपने अनुभव से एक मैं ही हूँ” यह मानकर एकाकी निःशंक रहिये