Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
निर्वाणवाक्यसंदर्भसमाप्तौ मुनिनायके ।
पाश्चात्यवाक्यविरतिं कुर्वति क्रमपालिताम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिवर, जीवन्मुक्त पुरुष नित्य एकमात्र ज्ञान में तल्लीन रहते हैं तथा
आत्मक्रीड रहते हँ अतएव वे कर्मो का परित्याग क्यो नहीं करते हैं ?
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ अठानबेवाँ सर्ग समाप्त एक सौ निन्यानवे सर्ग यद्यपि जीवन्मुक्त पुरुषों का न तो कर्मो के अनुष्ठान से कोई प्रयोजन है और न कर्मो के अनाचरण से कोई क्षति है तथापि वे सत्कर्म का (सदाचरणोका) अनुवर्तन करते हैं, यह वर्णन |