Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verses 8–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, verses 8–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 8- 17
संस्कृत श्लोक
देवदुन्दुभिभिः सार्धं तुषारासारसुन्दरी ।
दिग्भ्यः स्थगितदिक्चक्रा पुष्पवृष्टिः पपात ह ॥ ८ ॥
पुष्पौघपूरितस्थानः शब्दापूरितकन्दरः ।
रजःसंरञ्जिताकाशो गन्धरञ्जितमारुतः ॥ ९ ॥
स साधुवादशब्दस्य देवतूर्यरवस्य च ।
कुसुमासारघोषस्य समवायो रराज ह ॥ १० ॥
उन्मुखाखिलसभ्याक्षिरश्मिश्यामलितान्तरः ।
उत्कर्णमृगमातङ्गहयपक्षिपशुश्रुतः ॥ ११ ॥
सविस्मयभयोन्नेत्रबालकान्ताजनेक्षितः ।
विस्मयस्मेरवदनराजलोकावलोकितः ॥ १२ ॥
कुसुमासारसारेण शब्दशोभातिशायिना ।
संरम्भेण जगामाशु रोदोरन्ध्रमपूर्वताम् ॥ १३ ॥
पुष्पवर्षसुधाधौतं रटद्भूतसुघुंघुमम् ।
समतां सदनेनागात् ध्मातशङ्खशतेन खम् ॥ १४ ॥
भुवनं भूरिभांकारभासुरं सुरचारणैः ।
वृतं मत्तोत्सवं रेजे समं कुसुममण्डितम् ॥ १५ ॥
शनैर्दुन्दुभिसिद्धौघवाक्यपुष्पभरः समम् ।
प्रययौ रोदसीरन्ध्रे वेलाचलमिवाम्बुधौ ॥ १६ ॥
तस्मिन्विबुधसंरम्भे क्षणेन समये गते ।
वाक्यानीमानि सिद्धानामभिव्यक्तिमुपाययुः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि कर्मो में प्रवृत्त हुए लोगों को द्रव्योपार्जन, ऋत्विजो को प्रसन्न करना आदि तथा अनुष्ठानयोग्य
कार्य के निर्णय के श्रमसाध्य होने के कारण बहुत से दोषों की प्राप्ति होती है तथापि समदर्शनता और
विचक्षणता के बल से उसका परिहार हो सकता है, इस आशय से कहते हैं।
हे महाबाहो, इस पृथिवी में सकल शास्त्रों तथा लोक का रहस्य जाननेवाले बहुत से विचक्षण पुरुष
प्रचुर दोषों में भी अपनी समदर्शनतावश पूर्णरूप से विहार करते हैं । भूलोक में स्थित कुछ गृहस्थ,
जीवन्मुक्त गतसंग होने के कारण बुद्धि से यथाप्राप्त वर्णाश्रम की अनुवृत्तिवश व्यवहार करते हैं। जनक
आदि तत्त्वज्ञानी राजर्षि तथा आपके सदृश वीतराग और राजा लोग अनासक्त बुद्धि हैं अतएव त्रिविध
सन्ताप शून्य होकर राज्य करते है । कोई अपने अपने वर्णाश्रमानुरूप प्राप्त वेदार्थ का अनुसरण करनेवाले
देव-पितृयज्ञ से अवशिष्ट अन्न का भोजन करनेवाले नित्य अग्निहोत्र आदि कर्मो में निरत हैं । ब्राह्मण
आदि चारों वर्णो में कोई लोग नित्य ध्यान, देवार्चन आदि स्वकर्म का अनुष्ठान करते हुए विविध चेष्टा
से स्थित हे । कोई महान् आशयवाले महापुरुष अपने अन्तःकरण में फलासक्ति का त्याग कर नित्य
सकल नित्य, नैमित्तिक कर्मो में परतन्त्र होकर तत्त्वज्ञानी होते हुए ही अज्ञानी की तरह स्थित है । कुछ
लोग अत्यन्त निर्जन वनभूमियों मे, जिनमें स्वप्न में भी लोगों का दर्शन नहीं होता तथा अत्यन्त रमणीय
मृगछौने भरे रहते हैं, ध्यानमग्न रहते हैँ । कुछ लोग सदा पुण्यात्माओं से परिवेष्टित पुण्य की वृद्धि
करनेवाले शमपूर्ण सदाचारसम्पन्न पुण्यतीर्थं तथा मुनियो के आश्रम आदि में स्थित हैँ । कोई समचित्त
पुरुष रागद्वेष की निवृत्ति के लिए (#) बन्धुजनावृत्त स्वदेश -का त्याग कर अन्य देश में स्थान बनाकर
स्थित हँ । कोई ज्ञानी पुरुष संसार की निवृत्ति के लिए एक वन से दूसरे वन में, एक नगर से दूसरे नगर
में, एक स्थान से दूसरे स्थान में तथा एक पर्वत से दूसरे पर्वत में घूमते हुए स्थित हे