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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verses 30–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 30,31

संस्कृत श्लोक

दशरथ उवाच । क्षयातिशयमुक्तेन परमेणात्मवस्तुना । परान्तः पूर्णतोत्पन्ना बोधेनारुन्धतीपते ॥ ३० ॥ न तदस्ति महीपीठे दित्य देवेषु वापि च । महत्किंचिद्यदप्राप्तं तव पूज्यस्य पूजनम् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

तो क्या उनके द्वारा अनुष्ठित वनवास आदि भी संसार को पार कर जाने में कारण हैं ? इस शंका पर नकारात्मक उत्तर देते हैं । न वनवास संसार को पार करने में हेतु है, स्वदेशनिवास संसार से मुक्ति पाने में कारण है और न कष्टप्रद विविध तपस्याएँ ही संसार निवृत्ति मेँ कारण हैं । न तो कर्म का परित्याग संसारनिवृत्ति में कारण है और न सत्कर्मो के आचरणं से पीछे होनेवाले जो ख्यातिलाभ, एश्वर्य, वरशापसामर्थ्यरूप विचित्र फलराशियाँ हैं, वे संसार से छुटकारा पाने के कारण हैं