Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 19
अठारहवाँ सर्ग समाप्त उन्नीसर्वों सर्ग जीव का स्वरूप, उसका तत्त्व, समष्टि -व्यष्टि शरीरो की कल्पना तथा स्थान एवं कारणों की भिन्नता से भोग भेद - इन सबका वर्णन ।
36 verse-groups
- Verse 1श्रीरामजी ने कहा : हे मुने, जीव का जो स्वरूप है यानी शास्त्रीय व्यवहार मेँ उपयोगी तथा जैस…
- Verse 2जीवशब्द से कहा जाता है
- Verse 3उसका पारमार्थिक स्वरूप बत्लाते है। भद्र, जो परम अणुरूप नहीं है, जो स्थूल नहीं है, जो न शू…
- Verse 4जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म वस्तुओं से भी सूक्ष्म है, जो गुरुतर वस्तुओं में सबसे बढ़-चढ़कर गुरुत…
- Verse 5जीव की स्वव्याफकता को अनुभव पर बढ़ाते हैं जिस-जिस पदार्थ का जो असाधारण स्वरूप है, उस-उस प…
- Verse 6हे श्रीरामजी, अतएव समष्टिजीव जहाँ पर जिस रूप से संकल्प करता है, वहाँ पर उस रूप का हो जाता…
- Verse 7ऐसी स्थिति में यह निष्कर्ष निकला कि जो चित्राविचित्र समस्त वस्तुओं का समष्टिजीव को शरास ह…
- Verse 8इसलिए मुक्ति, चुवृष्ति ओर बहाप्रनय-काल में बाह्य आभ्यन्तर सी पदार्थ चेतन में: जीक्भाव के…
- Verse 9अब जीव किस-किस तरह के आकारें को ग्रहण करता है, इसको बतलाने के लिए सबसे पहले अनेक प्रकार क…
- Verses 10–12अब सुक्ष्मभूतों के संस्कारो की उत्पत्तिृप समाष्टिवित्त की कल्पना बतलाते हैं / अनन्तर देश,…
- Verse 13अनन्तर इस तरह का जाना गया उक्त चेतन अपने स्वरूप में तत्काल स्थूलरूपता का (पंचीकरण से स्थू…
- Verse 14विराट देह में उसके भरोगर की उपपत्ति के लिए समष्टिरूय मन से आदित्यादि रुप पाँच इन्द्रियों…
- Verse 15इसके बाद पाँच इन्द्रियों के अलग-अलग पांच स्थानों के रूप में यह अपना अनुभव करता है ओर उनके…
- Verse 16पीछे आदित्य, दिशा, जल, वायु ओर पृथिवीरूप पाँच इन्द्रिय -स्थानरूप अवयवो से युक्त होकर रूप…
- Verse 17उनके मनोमयरूप होने पर भी स्वत:प्रिद्ध जानेश्वर्य से एव सब शक्तियों से सम्पन्न होने के कार…
- Verse 18समस्त प्राणियों का समष्टिरूप अद्बय विराट् पुरुष परम परमेश्वररूप है और पंचभूतात्मा न होने…
- Verse 19ईश्वररुप होने से वह अपने आविभवि और तिरोभाव में बिलकुल स्वतन्त्र है, यह कहते हैं । सर्वशक्…
- Verse 20अपने संकल्प से कल्पित अनेक कल्पां में तथा क्षणभर में वह अपनी इच्छा के अनुसार स्वयं उदित ह…
- Verse 21केवल मनोमात्रस्वरूपात्मक यह जीव ही सबके उपादानभूत ईश्वररूप प्रकृति का शरीर है और यही व्यष…
- Verse 22यही अव्यक्त अनन्त आकाशात्मा परमेश्वर पिपीलिकादि सूक्ष्म देहों में सूक्ष्म, स्थूल पदार्थों…
- Verse 23हे श्रीरामजी, मूर्तं एवं अमूर्तस्वरूप पंचज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रियसहित प्राण, षष्टेन्द्…
- Verse 24उसीने अपने चार मुखों से शब्दार्थो की कल्पना से युक्त इन चारों वेदों का गान किया है। उसीने…
- Verse 25अनन्त आकाश इस पुरुष का मस्तक है, पृथिवी इसके पैर का तलवा है, मध्याकाश इसका उदर (&) है तथा…
- Verse 26अनन्त लोक इस विराट् पुरुष के पार्श्व के अवयव हे, जल रक्त हैं, समस्त पर्वत मांसपेशियाँ है…
- Verse 27ये सब समुद्र रक्तसंचय की पेशियाँ हैं, सभी द्वीप छः कोशों के वेष्टन हैं, दिशाएँ बाहु हैं औ…
- Verse 28आवह, प्रवह आदि उनचास पवन इसी प्राणवायु, मार्तण्डमण्डल इसकी क्रूर आँखें और बडवानल इसका चित…
- Verse 29चन्द्रमण्डल ही इस विराट् पुरुष का जीव, श्लेष्मा, वीर्य, बल, चर्बी और संकल्पात्मक मन है त…
- Verse 30बीजादिभाव भी मन का ही होता है, यह कहते हैं । चन्द्ररूपी मन ही शरीररूपी वृक्ष का मूल, कर्म…
- Verse 31वही विराट् शरीर में जीव है, क्योकि अन्नरूप उसी च्रे समष्टि प्राणो का धारण होता है, इस (&…
- Verses 32–33उम्नीको फिर स्पष्टरूप से कहते हैं इस चन्द्ररूपी विराट् जीव से इन तीनों लोकों में सब जीव…
- Verse 34इस चन्द्ररूपी विराटजीव के संकल्पस्वरूप ही ये ब्रह्मा (७) विष्णु और भगवान् शंकर आदि देवता…
- Verse 35इसलिए, हे रघुद्रह, इस चन्द्रमण्डल को ही आप सम्पूर्ण जीवसमष्टिरूप विराट् जीव का स्थान और…
- Verse 36चन्द्ररूपी विराट् जीव से व्यष्टि जीव का प्रसार जो पहले कहा गया है उस्रका उपपादन करते हैं…
- Verse 37वे ही जीवित प्राणियों के शरीरों में जीव होकर जीते हैं और मन हो करके अनेक जन्मों के कारणभू…
- Verse 38हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह नानाविध आचारों से युक्त असंख्य विराट् के शरीर तथा असंख्य महाक…
- Verse 39हे श्रीरामजी, ब्रह्म से अभिन्न, अतएव अवधिशून्य एवं महान् व्यष्टि ओर समष्टि के देहसम्बन्ध…