Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
पवनस्य यथा स्पन्दश्चेत्यं जीवस्य वै तथा ।
स्वसंविन्मात्रनिर्णेयं नोपदेशाम यक्षवत् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति में यह निष्कर्ष निकला कि जो चित्राविचित्र समस्त वस्तुओं का समष्टिजीव को
शरास होता हैं, वह शरासरूप सर्ग पवन के स्यन्द की नार स्रमष्टिजीव का स्वानुभव सिद्ध स्वभाव है,
न कि बालक की यक्ष्रान्ति के सद्रथ उपदेशाभ्यासर से उत्पन्न हैं, यह कहते हैं ।/
जैसे पवन की संचलन क्रिया स्वभाव सिद्ध है, वैसे ही समष्टिजीव का चित्रविचित्र वस्तुओं का
अनुभवात्मक सर्ग (संसार) स्वभाव ही है, यह अपने अनुभव से निर्णय कर लेना चाहिए, बालक की
यक्षभ्रान्ति के सदूश इसका इस उपदेश से साधन करना नहीं चाहते