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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verses 10–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, verses 10–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 10-12

संस्कृत श्लोक

देशकालक्रियाद्रव्यचर्चिताचर्चितां स्वयम् । असत्यां सत्यवत्स्फारां तावन्मात्रशरीरिकाम् ॥ १० ॥ चेतसा ह्यसदाकारां प्रालेयपरमाणुताम् । पश्यत्यात्मन्यथात्मत्वे स्वप्ने स्वमरणोपमाम् ॥ ११ ॥ स्वप्नस्वावयवान्यत्वसदृशीं तां विभावयन् । विस्मृत्य चेतनां सत्तां तत्तामेवाशु गच्छति ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

अब सुक्ष्मभूतों के संस्कारो की उत्पत्तिृप समाष्टिवित्त की कल्पना बतलाते हैं / अनन्तर देश, काल, क्रिया और द्रव्य से युक्त (संस्काररूप से थोड़ा-सा आविर्भाव होने के कारण युक्त) एवं उनसे अयुक्त (स्थूलरूप से भलीभाँति आविर्भाव न होने के कारण अयुक्त) स्वयं असत्य होती हुई भी सत्य वस्तु के सदृश स्फुरित हो रही, केवल असत्य स्वरूपवाली समष्टिचित्तरूपता के कारण तथा सूक्ष्मतम जल का सम्बन्ध होने के कारण हिम परमाणु के सदृश, असदाकार परमाणुरूपता का आत्मा में अवलोकन करता है यानी आत्मा को परिच्छिन्न समझ बैठता है । अपनी आत्मरूपता के विषय में, स्वप्न में अपने मरण के सदुश तथा स्वप्न मेँ बाघ आदि रूपता के दर्शन से प्रतीयमान अपने हाथ, पैर आदि अवयवो की अन्यरूपता के सदुश उसकी (समष्टि चित्तरूप विष्णुरूपता की) भावना करता हुआ चेतन सत्ता को भूलकर उसी की कल्पना के पीछे-पीछे दौडता रहता है