Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
न पराणुर्न च स्थूलं न शून्यं न च किंचन ।
चिन्मात्रं स्वानुभूत्यात्म सर्वगं जीव उच्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसका पारमार्थिक स्वरूप बत्लाते है।
भद्र, जो परम अणुरूप नहीं है, जो स्थूल नहीं है, जो न शून्यस्वरूप है, जो शून्य आकाश के
अन्तर्गत है, जो चिन्मात्र, अनुभवस्वरूप है और सर्वत्र व्यापक है, वही जीव कहलाता है