Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
मुने जीवस्य यद्रूपमाकृतिग्रहणं तथा ।
यथा च परमात्मत्वं स्थानं यच्चास्य तद्वद ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी ने कहा : हे मुने, जीव का जो स्वरूप है यानी शास्त्रीय व्यवहार मेँ उपयोगी तथा
जैसा पारमार्थिक उसका रूप है, उसकी स्थूल देह की जैसी कल्पना होती है, जिस रीति से उसकी
परमात्मरूपता है तथा जो उसका स्थान हो, वह सब हमसे कहिए
सर्ग सन्दर्भ
अठारहवाँ सर्ग समाप्त उन्नीसर्वों सर्ग जीव का स्वरूप, उसका तत्त्व, समष्टि -व्यष्टि शरीरो की कल्पना तथा स्थान एवं कारणों की भिन्नता से भोग भेद - इन सबका वर्णन ।