Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
यथैवास्पन्दनाद्वातः सन्नेवैत्य सदात्मताम् ।
तथैवाचेतनाज्जीवो जीवन्नेति परां गतिम् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए मुक्ति, चुवृष्ति ओर बहाप्रनय-काल में बाह्य आभ्यन्तर सी पदार्थ चेतन में:
जीक्भाव के रहते भी, शान्त हो जाते हैं; यह कहते हैं /
जैसे संचलन क्रिया के न होने से अपना अस्तित्व रहते भी वायु असद्रूप बन जाता है, वैसे ही
चित्र-विचित्र पदार्थों का प्रकाश न होने से मुक्ति आदि अवस्थाओं में अपना अस्तित्व रहते भी
जीव ब्रह्मरूप बन जाता है